Friday, January 30, 2009

नज़रिया

हालात के साथ नज़रिया,
नज़रिये के साथ हालात बदल गया होगा |
एक ज़िंदगी को जीते जीते,
जीने का अंदाज़ बदल गया होगा |

एक झरोखा बनाया था अपनी दीवार में,
गये साल एक पंछी ने नीड़ बना डाला |
इस घर में अंधेरा है बहुत,
वरना दिन तो निकल गया होगा |

आज हवा में नमी है बहुत,
कोई सावन दिवार में थम गया होगा |
रिस्ते पानी ने नयी इबारत लिख दी,
उसका नाम तो अब मिट गया होगा |

2 comments:

Vandana Bhatia said...

Well done !

Anonymous said...

Likhne ko to log bahut khuch hota hai likh nahin paate. Nazriya to hota hai per dekh nahin paate. Kabhi sochne ko maan karta hai to soch nahin paate, waqt guzaar jaata hai kyunki wo kiski nazar rehta nahin.