समुन्दर की रेत पर बेतहाशा दौड़ती ज़िन्दगी ,
रेत के घरोंदे को देख कर ठिठक सी गई ,
फ़िर वही नन्हा खवाब वो बालहठ |
एक बार फ़िर दिल ने चाहा
रंगीन पानी को मुठ्ठी में भरना,
हाथ आई तो वही कोरी लकीरें |
जिनकी नियति में दौड़ना लिख दे
खुदा उसे थमने का एहसास ही क्यों दे?
एक साँस में दौड़ जाऊँ तो शायद
मंजिल पे दो घड़ी साँस भी मिले ?
It rained so..
1 year ago

2 comments:
"..ek saans mein daud jaoon..." - wah! Kya likha hai!!
thanks :-)
Post a Comment