Monday, December 1, 2008

एक दौड़

समुन्दर की रेत पर बेतहाशा दौड़ती ज़िन्दगी ,
रेत के घरोंदे को देख कर ठिठक सी गई ,
फ़िर वही नन्हा खवाब वो बालहठ |

एक बार फ़िर दिल ने चाहा
रंगीन पानी को मुठ्ठी में भरना,
हाथ आई तो वही कोरी लकीरें |

जिनकी नियति में दौड़ना लिख दे
खुदा उसे थमने का एहसास ही क्यों दे?
एक साँस में दौड़ जाऊँ तो शायद
मंजिल पे दो घड़ी साँस भी मिले ?

2 comments:

VSood said...

"..ek saans mein daud jaoon..." - wah! Kya likha hai!!

Seema Garg said...

thanks :-)