रफ्तार से उड़ते बादल के कदम ठिठक से गए..
वो बरगद फ़िर आकाश को ताकता है,
सैंकड़ों हाथ फैला कर दुआ मांगता है|
अपनी बाहों में घरौंदों को संभाले,
अपनी छाया में सुकून बखेरे,
फ़िर हवाओं में अपनी दुआ गुनगुनाता है|
बूढ़ा बरगद-
जाने कैसी दुआ मांगता है
जो कबूल ही नही होती..ताउम्र|
It rained so..
1 year ago

0 comments:
Post a Comment