Wednesday, September 10, 2008

बरगद

रफ्तार से उड़ते बादल के कदम ठिठक से गए..
वो बरगद फ़िर आकाश को ताकता है,
सैंकड़ों हाथ फैला कर दुआ मांगता है|

अपनी बाहों में घरौंदों को संभाले,
अपनी छाया में सुकून बखेरे,
फ़िर हवाओं में अपनी दुआ गुनगुनाता है|

बूढ़ा बरगद-
जाने कैसी दुआ मांगता है
जो कबूल ही नही होती..ताउम्र|

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