Friday, November 7, 2014

उस पार

सागर मंथन -
हलाहल के पार
अमृत ही तो है |

अंधकार के पार -
गगन का विस्तार
असीम ही तो है |


कर पार .. गगन अपार
अपनी हार से मत हार |
मेरे अरमानों का विस्तार
इस पार से उस पार |
मेरे विश्वास का अंतराल
इस पार से उस पार |


पंछी उड़..तेरी उड़ान
तेरा नभ ,तेरा विस्तार |
अपार |

Sunday, March 16, 2014

अब नहीं लगता

अपने अँधेरों को नज़दीक से पढ़ा  है मैंने
अब उजालों से डर नहीं लगता।

अपनी कश्ती को तूफानों में गवाया है मैंने
अब डूबने से डर नहीं लगता।

अपने वजूद से जुदा हो कर जिया है मैंने
अब सायों से डर  नहीं लगता। 

एक और उजाला
एक और तूफान
एक और साया
एक और पैगाम
मेरा एक दिन अब मुझे बड़ा नहीं लगता।